1 .नेत्र-रोग-लुआव धीक्वार तीन माशे, अफीम एक रत्ती-धिसकर कनपटियो पर लेप लगाना आधे सिर के दर्द के लिये अत्यन्त गुणकारी है ।
गूदा घीक्वार छह माशे, फ्टिकरी श्वेत चार रत्ती। अच्छी प्रकार खरल करके आख पर लेप करने से आख की लाली नष्ट होती है, और आख की चोट के लिये लाभपद है ।
लुआव घीक्वार मे तनिक पिसी फिटकरी मिलाकर रात्रि समय ओस में रखें, प्रात छान कर शीशी मे रख लें । आख की लाली, कुक्करे, घुघ तथा जाले आदि मे दो बूद आंख मे टपकाना अत्यन्त लाभप्रद है ।
लुआव घीक्वार मलमल के कपडे मे छान लें । आंखों की लाली के लिए दो वूद डालें, अकसीर है । छानने के लिये काच का वर्तन प्रयोग कीजिए।
2.खांसी-दमा-लुआव घीवार एक तोला और पिसी सोठ एक माशा-मिलाकर उपयोग करने से तुरन्त लाभ होता है । लुआव घीक्वार डेड सेर को किसी मलमल के स्वच्छ कपडे मे खूब जोरदार हाथो मे मल कर छानें और कलईदार पतीली मे डालें । आच पर रख कर चम्मच से हिलाते रहें। आच धीमी होनी चाहिए । जब आधा सूख जाए तो लाहौरी नमक तीन तोले वारीक कर डालें, और चम्मच से हिलाते रहें । जव सारा लुग्राब सूख जाए तो उतार लें और ठण्डा होने पर बारीक कर रखें।
मधु मे मिलाकर दो रती उपयोग करने से सर्व प्रकार की खासी तथा दमा ठीक होता है।
3.जिगर विकार और तिल्ली-धीक्वार रस तीन पाव , अजवाइन एक छटाक, नौसादर दो तोले और काला नमक दो तोले-बोतल मे भर कर चार-पाच दिन धूप मे पढ़ा रहने दें। दिन मे दो-तीन बार हिला देना चाहिए ।
बढ़ी हुई तिल्ली कम करने के लिए तथा जिगर और पेट की शिकायतो मे छह माशे से एक तोला तक दिन मे तीन वार दें।
घीक्वार रस एक छटाक, पिसी हल्दी छह रत्ती-ऐसी एक-एक मात्रा प्रात. व साय पीए, जिगर और तिल्ली के लिए अत्यन्त लाभप्रद है। घीववार रस एक छटाक, पिसी हल्दी छह रत्ती-ऐसी एक-एक मात्रा प्रात. व साय पीए, जिगर और तिल्ली के लिए अत्यन्त लाभप्रद है।
गूदा घीक्वार चार सेर किसी काच के खुले बर्तन मे डाल-कर इसमें अजवाइन दो सेर और लाहौरी नमक एक पाव डालें और छाव मे रख दें। दिन मे दो तीन बार हिला दिया करें, जब तक कि घीक्वार का रस अजवाइन सोख न लें।
तीन से छह मागे तक यह अजवाइन गरम पानी से सेवन करना पेट-दर्द, बदहजमी, मूल, भूख न लगना तथा कब्ज आदि मे लाभप्रद है।
4 .जोड़ों का दर्द- गूदा धीक्वार एक सेर, तीन सेर गाय के दूध मे पकाए कि खोया बन जाय । इस खोय को अब थोडे गाय के घी मे भून लें । तत्पश्चात् गेहूँ का आटा चार छटाक, वेसन चार छटाक दोनो अलग-अलग घी मे भूनें और दो सेर चीनी की चाश्नी बनाकर हलुए के समान वनाए । ऊपर मे लौंग, अजवाइन दाना, बड़ी इलायची प्रत्येक छह मासे वारीक पीस कर छिडकें, वस हलुआ तैयार है।
मात्रा दो से पाच तोले तक दूध के साथ सेवन करें। गुणधर्म-जोडो के पुराने दर्द और पुरानी खांसी के लए विसेश रूप से गुणकारी है।
5.उदर-रोग-धीक्वार के मोटे-मोटे डठल लेकर दोनो ओर छीलें और दो-दो उगली के टुकड़े बनाए-ये वजन मे पाच सेर हो । इनमे बारीक पिसा नमक आधा सेर मिलाकर काच के बर्तवान मे डाल अच्छी प्रकार हलाए और ढक कर दो-तीन दिन तक धूप मे पडा रहने दें। दिन मे दो-तीन बार हिला देना चाहिए ।
तत्पश्चात् इसमें हल्दी दस तोले , दस तोले धनिया, दम तोले श्वेत जीरा, पन्द्रह तोलेे काली मिर्च, छह तोले भुनी हीग, तीस तोले अजवाइन,
सोठ दस तोले, पिपली साढे सात तोले, लोग पाच तोले, दारचीनी पाच तोले, खील मुहागा पाच तोलेे, अक्रररहा पाच तोले, काला जीरा दस तोले, दाना बड़ी इलायची पांच तोले, छोटी हरड तीस तोले, सौफ तीस तोले, राई तीस तोले बारीक पीसकर मिलाए, लेकिन छोटी हरड सावत ही डालें । कुछ दिन पश्चात् उपयोग मे लाए ।
गुण-धर्म-यह उचार पेट के प्राय रोग दूर करता है। बलगम को काटता है, भूख लगाता तथा कब्ज दूर करता है । तिल्ली काटता है ।
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